खाने को आधा, पानी को दूना, कसरत को तीन गुणा और हंसने को चौगुना करो ।

Tuesday, November 24, 2015

अष्टांग योग


महर्षि पातंजलि के बताये हुए राजयोग के आठ अंग हैं । (1) यम,(2) नियम,(3) आसन,(4) प्राणायाम,(5) प्रत्याहार,(6) धारणा,(7)ध्यान,(8) समाधि । इन आठ में प्रारम्भिक दो अंगों का महत्त्व सबसे अधिक है । इसीलिए उन्हें सबसे प्रथम स्थान दिया गया है । यम और नियम का पालन करने का अर्थ मनुष्यत्व का सवर्तोन्मुखी विकास है । योग का आरम्भ मनुष्यत्व की पूर्णता के साथ आरम्भ होता है । बिना इसके साधना का कुछ प्रयोजन नहीं । योग में प्रवेश करने वाले साधक के लिए यह आवश्यक है कि आत्म-कल्याण की साधना पर कदम उठाने के साथ-साथ यम-नियमों की जानकारी प्राप्त करें । उनको समझें, विचारें, मनन करें और उनको अमल में, आचरण में लाने का प्रयत्न करें । यम-नियम दोनों की सिद्धियाँ असाधारण हैं । महर्षि पातंजलि ने अपने योग दर्शन में बताया है कि इन दसों की साधना से महत्त्वपूर्ण ऋद्धि-सिद्धियाँ प्राप्त होती है । हमारा निज का अनुभव है कि यम-नियमों की साधना से आत्मा का सच्चा विकास होता है और उसके कारण जीवन सब प्रकार की सुख-शन्ति से परिपूर्ण हो जाता है । यम-नियम का परिपालन एक ऐसे राजमार्ग पर चल पड़ने के समान है जो सीधे गन्तव्य स्थल पर ही पहुँचाकर छोड़ता है । 'राजमार्ग' का अर्थ है आम-सड़क-वह रास्ता जिस पर होकर हर कोई चल सके, जिस पर चलने में सब प्रकार की सरलता, सुविधा हो, कोई विशेष कठिनाई सामने न आवे । राजयोग का भी ऐसा ही तात्पर्य है । जिस योग की साधना हर कोई कर सके, सरलतापूवर्क उसमें प्रगति कर सके और सफल हो सके, यह राजयोग है । हठयोग, कुण्डलिनी योग, लययोग, तंत्रयोग, शक्तियोग आदि उतने सरल नहीं है और न उनका अधिकार ही हर मनुष्य को है । उनके लिए विशेष तैयारी करनी पड़ती है, और विशेष प्रकार का रहन-सहन बनाना होता है, पर राजयोग में ऐसी शर्तें नहीं हैं, क्योंकि वह मनुष्य मात्र के लिए,स्त्री-पुरुष गृही-विरक्त, बाल-वृद्ध, शिक्षित-अशिक्षित सबके लिए समान रूप से उपयोगी और सरल है । योग का अर्थ है-मिलना । जिस साधना द्वारा आत्मा का परमात्मा से मिलना हो सकता है,उसे योग कहा जाता है । जीव की सबसे बड़ी सफलता यह है कि वह ईश्वर को प्राप्त कर ले, छोटे से बड़ा बनने के लिए, अपूर्ण से पूर्ण होने के लिए, बन्ध से मुक्त होने के लिए, वह अतीतकाल से प्रयत्न करता आ रहा है, चौरासी लक्ष योनियों को पार करता हुआ इतना आगे बढ़ा आया है, वह यात्रा ईश्वर से मिलने के लिए है, बिछड़ा हुआ अपनी स्नेहमयी माता को ढूँढ़ रहा है, उसकी गोदी में बैठने के लिए छटपटा रहा है । उस स्वर्गीय मिलन की साधना योग है और उधर बढ़ने का सबसे साफ, सीधा, सरल जो रास्त है, उसी का नाम राजयोग है । महर्षि पातंजलि ने इस योग को आठ भागों में विभाजन किया है । योगदर्शन के पाद 2 का 29 वाँ सूत्र है- यम नियमासन प्राणायाम प्रत्याहार धारणा ध्यान समाधयोङष्टावंगानि॥ अर्थात-यम, नियम, आसन, प्राणायाम,प्रत्याहार धारणा और समाधि योग के यह आठ अंग हैं । योग-दर्शन के पाद 2 सूत्र 30 में यम के सम्बन्ध में बताया गया है-अहिंसा सत्यास्तेय ब्रह्मचय्यार्परिग्रहा यमाः । अर्थात अहिंसा,सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह यह पाँच यम है । पाठकों को यम शब्द से भ्रम में नहीं पड़ना चाहिए,मृत्यु के देवता को भी यम कहते हैं, यहाँ उस यम से कोई तात्पर्य नहीं है यहाँ तो उपरोक्त पाँच व्रतों की एक संज्ञा नियत करके उसका नाम यम रखा गया है । यम शब्द से यहाँ उपरोक्त पाँच व्रतों का ही भाव है । आगे क्रमशः प्रत्येक के बारे में कुछ विवेचना की जाती है । अहिंसा साधारण रीति से दुःख न देने को अहिंसा कहते हैं । अहिंसा का अर्थ है मारना,दुःख देना । आ अर्थ है रहित । इस प्रकार अहिंसा का अर्थ हुआ, न मारना,न सताना, दुःख न देना । ऐसे कार्य जिनके द्वारा किसी को शारीरिक या मानसिक कष्ट पहुँचता हो हिंसा कहलाते हैं, इसलिए उनका करना अहिंसा व्रत पालन करने वाले के लिए त्याज्य है । महात्मा गाँधी के मतानुसार-कुविचार मात्र हिंसा है, उतावलापन हिंसा है, मिथ्याभाषण हिंसा है,द्वेष हिंसा है, किसी का बुरा चाहना हिंसा है, जिसकी दुनिया को जरूरत है उस पर कब्जा रखना भी हिंसा है, इसके अतिरिक्त किसी को मारना,कटुवचन बोलना, दिल दुःखाना, कष्ट देना तो हिंसा है ही इन सबसे बचना अहिंसा पालन कहा जायेगा । सामान्य प्रकार से उपरोक्त पंक्तियों में अहिंसा का विवेचन हो गया पर यह अधूरा और असमाधान कारक है । कोई व्यक्ति लोगों के सम्पर्क से बिल्कुल दूर रहे और बैठे-बैठे भोजन वस्त्र की पूरी सुविधाएँ प्राप्त करता रहे तो शायद किसी हद तक ऐसी अहिंसा का पालन कर सके, पूर्ण रीति से तो तब भी नहीं कर सकता क्योंकि साँस लेने में अनेक जीव मरेंगे, पानी पीने में सूक्ष्म जल-जन्तुओं की हत्या होगी,पैर रखने में, लेटने में कुछ न कुछ जीव कुचलेंगे, शरीर और वस्त्र शुद्ध रखने में जुयें आदि मरेंगे, पेट में कभी-कभी कृमि पड़ जाते हैं, मल त्यागने पर उनकी मृत्यु हो जायेगी । स्थूल हिंसा से कुछ हद तक बच जाने पर भी उस एकान्त सेवी से पूरी अहिंसा का पालन नहीं हो सकता । तक क्या किया जाय? क्या आत्म हत्या कर लें? या योग मार्ग की पहली ही सीढ़ी पर चढ़ना असम्भव समझ कर निराश हो बैठें? केवल शब्दार्थ से ही अहिंसा का भाव नहीं ढूँढ़ा जा सकता, इसके लिए योगिराज कृष्ण द्वारा अर्जुन को दी हुई व्यवहारिक शिक्षा का आश्रय लेना पड़ेगा । अर्जुन देखता है कि युद्ध में इतनी अपार सेना की हत्या होगी, इतने मनुष्य मारे जायेंगे, यह हिंसा है इससे मुझे भारी पातक लगेगा, वह धनुष बाण रख कर रथ के पिछले भाग में जा बैठता है और कहता है कि, हे अच्युत! मैं थोड़े से राज्य लोभ के लिए इतना बड़ा पाप न करूँगा, इस युद्ध में मैं प्रवृति न होऊँगा । भगवान कृष्ण ने अर्जुन की इस शंका का समाधान करते हुए गीता के अठारह अध्यायों में योग का उपदेश दिया, उन्होंने अनेक तर्क,प्रमाण, सिद्धान्त और दृष्टिकोणों से उसे यह भली प्रकार समझा दिया कि कष्ट न देने मात्र को अहिंसा नहीं कहते, दुष्टों, दुराचारियों, अन्यायी, अत्याचारियों को, पापी और पाजियों को मार डालना भी अहिंसा है । जिस हिंसा से अहिंसा का जन्म होता, जिस लड़ाई से शान्ति की स्थापना होती है, जिस पाप से पुण्य का उद्भव होता है, उसमें कुछ भी अनुचित या अधर्म नहीं है । कृष्ण ने अर्जुन से कहा इस मोटी बुद्धि को छोड़ और सूक्ष्म दृष्टि से विचार कर, अहिंसा की प्रतिष्ठा इसलिए नहीं है कि उससे किसी जीव का कष्ट कम होता है, कष्ट होना न होना कोई विशेष महत्त्व की बात नहीं है, क्योंकि शरीरों का तो नित्य ही नाश होता है और आत्मा अमर है, इसलिए मारने न मारने में हिंसा-अहिंसा नहीं है । अहिंसा का तात्पर्य है द्वेष रहित होना । निजी राग द्वेष से प्रेरित होकर संसार के हित-अनहित का विचार किए बिना जो कार्य किए जाते हैं वे पूर्ण हैं । यदि लोक कल्याण के लिए, धर्म की वृद्धि के लिए किसी को मारना पड़े या हिंसा करनी पड़े तो उसमें दोष नहीं हैं । अर्जुन ने भगवान के वचनों का भली प्रकार मनन किया और जब उसकी समझ में अहिंसा का वास्तविक तात्पर्य आ गया तो महाभारत में जुट पड़ा । अठारह अक्षौहिणी सेना का संहार हुआ तो भी अर्जुन को कुछ पाप न लगा । एक आप्त वचन है कि-वैदिक हिंसा, हिंसा न भवति अर्थात विवेकपूर्वक की हुई हिंसा नहीं है । जिह्वा की चाटुकारिता के लोभ में निरपराध और उपयोगी पशु-पक्षियों का माँस खाने के लिए उनकी गरदन पर छुरी चलाना पातक है । अपने अनुचित स्वार्थ की साधना के लिए निर्दोष व्यक्तियों को दुःख देना हिंसा है । किन्तु निःस्वार्थ भाव से लोक-कल्याण के लिए तथा उसी प्राणी के उपकार के लिए यदि उसे कष्ट दिया जाय तो वह हिंसा नहीं वरन् अहिंसा ही होगी । डॉक्टर निःस्वार्थ भाव से रोगी की वास्तविक सेवा के लिए फोड़े की चीरता है, एक न्यायमूर्त जज समाज की व्यवस्था कायम रखने के लिए डाकू का फाँसी की सजा का हुक्म देता है एक धर्म प्रचारक अपने जिज्ञासु साधक को आत्म-कल्याण के लिए तपस्या के कष्टकर मार्ग में प्रवृत्त करता है । मोटी दृष्टि से देखा जाय तो वह सब हिंसा जैसा प्रतीत होता है पर असल में यह सच्ची अहिंसा है । गुण्डे बदमाशों को क्षमा कर देने वाला, हरामखोरों को दान देने वाला, दुष्टता को सहन करने वाला, देखने में अहिंसक सा प्रतीत होता है पर असल में वह घोर पातक, हिंसक, हत्यारा है । वह एक प्रकार से अनजाने में दुष्टता की जहरीली बेल को सींचकर दुनिया के लिए प्राण घातक फल उत्पन्न करने में सहायक बनता है, ऐसी अहिंसा को जड़ बुद्धि अज्ञानी की अहिंसा कह सकते हैं । पातंजलि योग दर्शन के पाद 2 सूत्र 35 में कहा गया है कि-अहिंसा प्रतिष्ठायां तत्सन्निधौ बैर त्यागः अर्थात अहिंसा की साधना से उस योगी के निकट-मन में से बैर भाव निकल जाता है । बैर-भाव, द्वेष, प्रतिशोध की दृष्टि से किसी के चित्त को दुःखाना या शरीर को कष्ट देना सर्वथा अनुचित है, इस हिंसा से सावधानी के साथ बचना चाहिए । अहिंसक का अर्थ है प्रेम का पुजारी, दुर्भावना से रहित । सद्भावना और विवेक बुद्धि से यदि किसी को कष्ट देना आवश्यक जान पड़े तो अहिंसा की मर्यादा के अन्तर्गत उसी गुंजायश है । अहिंसक को बैर-भाव छोड़ना होता है, क्रोध पर काबू करना होता है, निजी हानि-लाभ की अपेक्षा कुछ ऊँचा उठना पड़ता है, उदार, निष्पक्ष और न्यायमूर्त बनना पड़ता है, तब उस दृष्टिकोण से जरा भी निर्णय किया जाय वह अहिंसा ही होगी । परमार्थ के लिए की हुई हिंसा को किसी भी प्रकार अहिंसा से कम नहीं ठहराया जा सकता है । महात्मा गाँधी का कथन है कि-अहिंसा से हम जगत को मित्र बनाना सीखाते हैं, ईश्वर की-सत्य की महिमा अधिकाधिक जान पड़ती है, संकट सहते हुए भी शांति और सुख में वृद्धि होती है, हमारा साहस-हिम्मत बढ़ती है । हम कर्तव्य-अकर्तव्य का विचार सीखते हैं । अभिमान दूर होता है, नम्रता बढ़ती है । परिग्रह सहज ही कम होता है और देह के अन्दर भरा हुआ मैल रोज कम होता जाता है । अहिंसा कायरों का नहीं वीरों का धर्म है । बैर त्याग कर, प्रेम भावना को ,आत्मीयता को, प्रमुख स्थान देते हुए, बुराई का मुकाबला करना अहिंसा है । बहादुरी, निर्भीकता, स्पष्टता, सत्यनिष्ठा,इस हद तक बढ़ा लेना कि तीर तलवार उसके आगे तुच्छ जान पड़ें, अहिंसा की साधना है । शरीर की नश्वरता को समझते हुए, उसके न रहने का अवसर आने पर विचलित न होना अहिंसा है । अहिंसक की दृष्टि दूसरों को सुख देने की होती है, अधर्म और अज्ञान को हटाने से ही दुःख की निवृत्ति और सुख की प्राप्ति हो सकती है । अहिंसा का पुजारी अपने और दूसरे के अधर्म और अज्ञान को हटाने का अविचल भाव से प्रबलतम प्रयत्न करता है जिससे सच्चा और स्थायी सुख प्राप्त हो, इस महान कार्य के लिए यदि अपने को या दूसरों को कुछ कष्ट सहना भी पड़े तो उसे उचित समझकर अहिंसक उसके लिए सदा तैयार ही रहता है । सत्य मोटे तौर से जो बात जैसी सुनी है उसे वैसी ही कहना सत्य कहा जाता है । किन्तु सत्य की यह परिभाषा बहुत ही अपूर्ण और असमाधानकारक है । सत्य एक अत्यन्त विस्तीर्ण और व्यापक तत्व है । वह सृष्टि निर्माण के आधार स्तम्भों में सब से प्रधान है । सत्य भाषण उस महान सत्य का एक अत्यन्त छोटा अणु है, इतना छोटा जितना समुद्र के मुकाबले में पानी की एक बूँद । सत्य बोलना चाहिए, पर सत्य बोलने से पहले सत्य की व्यापकता और उसके तत्व ज्ञान को जान लेना चाहिए, क्योंकि देश, काल और पात्र के भेद से बात को तोड़-मरोड़ कर या अलंकारिक भाषा में कहना पड़ता है । धर्म ग्रन्थों में मामूली से कर्मकाण्ड़ के फल बहुत ही बढ़ा-चढ़ा कर लिखे गए हैं । जैसे गंगा स्नान से सात जन्मों के पाप नष्ट होना, व्रत, उपवास रखने से स्वर्ग मिलना, गौ दान से वैतरणी तर जाना, मूर्ति पूजा से मुक्ति प्राप्त होना, यह सब बातें तत्व ज्ञान दृष्टि से असत्य हैं, क्योंकि इन कमर्काण्ड़ों से मन में पवित्रता का संचार होना और बुद्धि को कर्म की ओर झुकना तो समझ में आता है, पर यह समझ में नहीं आता कि इतनी सी मामूली क्रियाओं का इतना बड़ा फल जैसे महान साधनों की क्या आवश्यकता रहती? टेक सेर मुक्ति का बाजार गर्म रहता । अब प्रश्न उपस्थित होता है कि क्या वह धर्म ग्रन्थ झूठे हैं? क्या उन ग्रन्थों के रचयिता महानुभवों ने असत्य भाषण किया है? नहीं उनके कथन में भी रत्ती भर झूठ नहीं है और न उन्होंने किसी स्वार्थ बुद्धि से असत्य भाषण किया है । उन्होंने एक विशेष श्रेणी के, सत्य बुद्धि के, अविश्श्वासी, आलसी और लालची व्यक्तियों को उनकी मनोभूमि परखते हुए एक खास तरीके से अलंकारिक भाषा में समझाया है । ऐसा करना अमुक श्रेणी के व्यक्तियों के लिए आवश्यक था, इसलिए धर्म ग्रन्थों का वह आदेश एक सीमा में सत्य ही है । बच्चे के फोड़े पर मरहम पट्टी करते हुए डॉक्टर उसे दिलासा देता है । बच्चे! डरो मत, जरा भी तकलीफ न होगी । बच्चा उसकी बात पर विश्वास कर लेता है, किन्तु डॉक्टर की बात झूठी निकलती है । मरहम पट्टी के वक्त बच्चों को काफी तकलीफ होती है, वह सोचता है कि डॉक्टर झूठा है, उसने मेरे साथ असत्य भाषण किया परन्तु असल में वह झूठ बोलता नहीं है । अध्यापक बच्चों को पाठ पढ़ाते हैं, गणित सिखते हैं, समझाने के लिए उन्हें ऐसे उदाहरण देने पड़ते हैं, जो अवास्तविक और असत्य होते हैं, फिर भी अध्यापक को झूठा नहीं कहा जाता । जिन्हें मानसिक रोग हो जाते हैं या भूत-प्रेत लगने का बहम हो जाता है, उनका तान्त्रिक या मनोवैज्ञानिक उपचार इस प्रकार करना पड़ता है जिससे पीड़ित का बहम निकल जाय । भूत लगने पर भूतहे ढ़ंग से उसे अच्छा किया जाता है, यदि बहम बता दिया जाय तो रोगी का मन न भरेगा और उसका कष्ट न मिटेगा । तान्त्रिक और मनोविज्ञान के उपचार में प्रायः नब्बे फीसदी झूठ बोलकर रोगी को अच्छा करना पड़ता है, परन्तु वह सब झूठ की श्रेणी में नहीं ठहराया जाता । राजनीति में अनेक बार झूठ को सच सिद्ध किया जाता है । दुष्टों से अपना बचाव करने के लिए झूठ बोला जा सकता है । दम्पति अपने गुप्त सहवास को प्रकट नहीं करते । आर्थिक व्यापारिक या अन्य ऐसे ही भेदों को प्रायः सच-सच नहीं बताया जाता । कई बार सत्य बोलना भी निषिद्ध होता है । काने को काना और लँगड़ा को लँगड़ा कहकर सम्बोधन करना कोई सत्य भाषण थोड़े ही है । फौजी गुप्त भेदों को प्रकट कर देने वाला अथवा दुश्मन को अपने देश की सच्ची सूचना देने वाला अपराधी समझा जाता है और कानून से उसे कठोर सजा मिलती है । भागी हुई गाय का पता कसाई को बता देना क्या सत्य भाषण हुआ? इस प्रकार बोलने में ही सत्य को सर्वादित कर देना एक बहुत बड़ा भ्रम है, जिसमें अविवेकी व्यक्ति ही उलझे रह सकते हैं । सच तो यह है कि लोक-कल्याण के लिए देश, काल और पात्र का ध्यान रखते हुए नग्न सत्य की अपेक्षा अलंकारिक सत्य भाषण से ही काम, लेना पड़ता है । जिस वचन से दूसरों की भलाई होती हो, सन्मार्ग के लिए प्रोत्साहन मिलता हो, वह सत्य है । कई बार हीन चरित्र वालों की झूठी प्रशंसा करने पर वे एक प्रकार की लोक लाज में बँध जाते हैं और सम्मोहन विद्या के अनुसार अपने को सचमुच प्रशंसनीय अनुभव करते हुए निश्चयपूवर्क प्रशंसा योग्य बन जाते हैं । ऐसा असत्य भाषण सत्य कहा जायेगा । किसी व्यक्ति के दोषों को खोल-खोल कर उससे कहा जाय तो वह अपने को निराश, पराजित और पतित अनुभव करता हुआ वैसा ही बन जाता है । ऐसा सत्य, असत्य से भी बढ़कर निन्दनीय है । भाषण सम्बन्धी सत्य की परिभाषा होनी चाहिए कि जिससे लोक-हित हो वह सत्य और जिससे अहित हो वह असत्य है । मित्र धर्म का विवेचन करती हुई रामायण उपदेश देती है कि-गुण प्रकटै अवगुणहिं दुरावा वहाँ दुराव को असत्य को, धर्म माना गया है । आपका भाषण कितना सत्य है, कितना असत्य, इसकी परीक्षा इस कसौटी पर कीजिए कि इससे संसार का कितना हित और कितना अहित होता है? सद्भावनाओं की उन्नति होती है या अवनति, सद्विचारों का विकास होता है या विनाश । पवित्र उद्देश्य के साथ निःस्वार्थ भाव से परोपकार के लिए बोला हुआ असत्य भी सत्य है और बुरी नीयत से, स्वार्थ के वशीभूत होकर पर पीड़ा के लिए बोला गया सत्य भी असत्य है । इस मर्म को भलीभाँति समझकर गिरह में बाँध लेना चाहिए । वास्तविक और व्यापक सत्य ऊँची वस्तु है । वह भाषण का नहीं, वरन् पहचानने का विषय है । समस्त तत्वज्ञानी उसी महान तत्व की अपनी-अपनी दृष्टि के अनुसार व्याख्या कर रहे हैं । विश्व की रंगस्थली, उसमें नाचने वाली कठपूतलियाँ, नचाने वाला तन्त्री तत्वतः क्या है, इसका उद्देश्य और कार्य-कारण क्या है, इस भूल-भुलैयों के खेल का दरवाजा कहाँ है, यह बाजीगरी विद्या कहाँ से और क्योंकर संचालित होती है? इसका मर्म सत्य का शोध है । ईश्वर, जीव, प्रकृति के सम्बन्ध में जानकारी प्राप्त करके अपने को भ्रम-बन्धनों से बचाते हुए परम पद प्राप्त करने के लिए आगे बढ़ना मनुष्य जीवन का ध्रुव सत्य है । उसी सत्य के प्राप्त करने के लिए हमारा निरन्तर उद्योग होना चाहिए । भगवान वेद व्यास ने योगदर्शन 2/38 का भाष्य करते हुए सत्य की विवेचना इस प्रकार की है- परत्र स्वबोध संक्रान्तये बागुप्ता सा यदि वञ्चिता भरान्ता व प्रतिपत्ति बन्ध्या वा भवेदिति । एथ सवर्भूतोपकराथर् प्रवृत्ता, त भूतोपघाताय । यदि चैवमय्यभिधीयमाना भूतोपघात परैवस्यान्न सत्यं भवेत् पापमेव भवेत् । अर्थात-सत्य वह है चाहे वह ठगी, भ्रम, प्रतिपत्ति बन्ध्या युक्त हो अथवा रहित । तो प्राणिमात्र के उपकारार्थ प्रयुक्त किया जाय न कि किसी प्राणी के अनिष्ट के लिए । यदि सत्यतापूर्वक कही गई यथार्थ बात से प्राणियों का अहित होता है-तो वह सत्य नहीं । प्रत्युत सत्याभाष ही है और ऐसा सत्य भाषण असत्य में परिणत होकर पाप कारक बन जाता है । जैसे कसाई के पूछने पर कि-गाय इधर गई है? यदि हाँ में उत्तर दिया जाय तो यह सत्य प्रतीत होने पर भी सत्य नहीं, प्रत्युत प्राणी घातक है । अन्य उपाय न रहने पर विवेकपूर्वक सत्कार्य के लिए असत्य भाषण करना भी सत्य ही है । महाभारत ने सत्य की मीमाँसा इस प्रकार की है- न तत्व वचन सत्यं, न तत्व वचनं मृषा । यद्भूत हितमत्यन्तम् तत्सयमिति कथ्यते॥ अथार्त्-बात को ज्यों को त्यों कह देना सत्य नहीं है और न बात को ज्यों की त्यों कह देना असत्य है । जिसमें प्रणियों का अधिक हित होता है, वही सत्य है । सत्य को वाणी का एक विशेषण बना देना उस महातत्व को अपमानित करना हैं । सत्य बोलना मामूली बात है जिसमें आवश्यकतानुसार हेर-फेर भी किया जा सकता है । सत्य को ढूँढ़ना, वास्तविकता का पता लगाना और जो-जो बात सच्ची प्रतीत हो उस पर प्राण देकर भी दृढ़ रहना, यह सत्य परायण है । यम की दूसरी सीढ़ी सत्य बोलना नहीं, सत्य परायण होना है । योग मार्ग के अभ्यासी के सत्यवादी होने की अपेक्षा सत्य परायण होने को साहस, निर्भीकता और ईमानदारी के साथ करना चाहिए । अस्तेय चोरी न करना अस्तेय को यही संक्षिप्त अर्थ है, पराई चीज को बिना उसकी आज्ञा के गुप्त रूप से ले लेने को चोरी कहते हैं । दूसरे की कमाई का अनुचित रूप से अपहरण करना चोरी है,जिस वस्तु पर न्यायतःअपना स्वत्व नहीं है उसे उसके स्वामी की बिना जानकारी में या बलात्कारपूर्वक ले लेना स्तेय है, इससे बचना अस्तेय कहा जायेगा । पराई चीज को बिना उसकी स्वीकृति के ले लेना यह चोरी का मोटा अर्थ है । पशुओं का दूध, भेड़ के बाल, मक्खियों का शहद, यह पराई चीज भी हैं और उनकी स्वीकृति के बिना भी ली जाती हैं । पिता की कमाई हुई जायदाद पराई है यदि पिता न चाहते हों तो भी उनके बाद उस सम्पत्ति का अधिकार पुत्र को ही प्राप्त होगा । अपराधी से अदालत जुर्माना वसूल करती है, राज्याधिकारी आयकर,चुँगी आदि वसूल करते हैं, वह रकमें पराई हैं और मालिक इच्छापूर्वक भी नहीं देते तो भी वह चोरी नहीं है । (1) पराई चीज और(2) बिना आज्ञा इन दो ही तत्वों के आधार पर स्तेय का ठीक-ठीक निर्णय नहीं हो सकता । मान लीजिए कि व्यक्ति दबाव के कारण किसी वस्तु को देने के लिए तैयार किया जाता है और वह लाचारी में आज्ञा दे देता है तो क्या वह अस्तेय हो गया? कोई व्यक्ति अपने पास दूसरे की अमानत जमा किए हुए है किन्तु अब नीयत बिगड़ जाने से उस पर अपनी मालिकी बताता है ओर असली मालिक को उसे लौटाने से इन्कार करता है, क्या उससे वह अमानत बलपूर्वक न लौटानी चाहिए । क्या वर्तमान समय में पराई चीज दिखाई पड़ने के कारण और बेइमानी से आज्ञा न मिलने के कारण उस अमानत को छोड़ बैठना चाहिए? मोटे मौर पर स्तेय और अस्तेय की विवेचना करने पर बहुत भ्रम हो सकता है । बहुत बार ऐसा होता है कि वह वस्तु पराई भी नहीं है और आज्ञा का भी प्रश्न नहीं उठता तो भी वह चोरी हो जाती है । जैसे एक दुकानदार अपने बाँट कम रखता है, पलड़ों में पासंग रखता है या कम तोलता है, दुकान में रखी हुई चीजें पराई नहीं है और उनमें से इतनी निकाल लेने या कम देने के लिए किसी से आज्ञा लेने की भी जरूरत नहीं है । सेर भर (1 सेर=933 ग्राम) के स्थान पर उसने पन्द्रह छटांक (1 छटांक=58 ग्राम) चीज दी, वह एक छटांक जो बचाया गया है, शाब्दिक परिभाषा के अनुसार वह चोरी में शुमार नहीं होता तो भी वास्तव में वह चोरी ही है । दर्जी लोग सिलाई में कपड़ा बचाते हैं, धोबी कपड़ों को कई दिन घसीटकर पहनते हैं, चक्की वाले आटा बचाते हैं, नौकर आठ पैसे की चीज मँगाने पर सात पैसे की लाकर देते हैं, असली मालिक को इन चोरियों का पता नहीं लग पाता, इस ओर अधिक ध्यान भी नहीं जाता तो भी इनकी गणना चोरी में ही होगी, मालिक को अपनी हानि का पता न चले और गुप्त या अप्रत्यक्ष रूप से कोई चुपके-चुपके कुछ करता रहे तो भले ही वह प्रकट न होने पाये पर होगी वह चोरी ही । कर्तव्य की चोरी अपने ढंग की बड़ी गहत चोरी है । मजदूरी तय करके जितना समय या जैसा काम करने का ठहराव किया गया है उसमें कभी करना, आलस्य करना, जो चुराना , बेगार भुगतना आजकल मामुली बात हो गई है पर यह ठीक वैसी ही चोरी है जैसे किसी का ताला तोड़कर माल असबाब ले जाना । विश्वसनीय गुप्त कार्य को करने की जिम्मेदारी अपने ऊपर लेकर उसका भेद प्रकट कर देना, किसी की कृति को बनाना, अनाधिकार चेष्टा करना चोरी है । अपने फर्जों को अदा न करना, आश्रितों की उपेक्षा करके स्वयं विशेष सुविधाएँ भोगना, यह भी उसी सीमा में आता है जैसे-बच्चों से छिपाकर कोई चीज खाते हैं । पड़ी हुई चीज मिले तो उसके मालिक की तलाश कर उस तक पहुँचानी चाहिए,सब पर प्रकट कर देना चाहिए या मालिक का पता न चले तो अधिकारी संस्था को सौंप देना चाहिए । यदि ऐसा न किया जाय और वह वस्तु अपने पास चुपचाप रखली जाय तो वह भी चोरी है, न करने योग्य कार्य के लिए, अग्राह्य वस्तु के लिए, मन ललचाना, इसी श्रेणी का कार्य है । अपना नियत कर्तव्य करने के बदले में पुरस्कार माँगना, न करने योग्य कार्य को करने के लिए भेंट लेना यह दोनों प्रकार की रिश्वतें चोरी ही तो हैं । रिश्वतों का किस कदर बाजार गर्म है यह किसी से छिपा नहीं है, जिसको जिस काम के लिए नियत किया गया है वह उसी काम को करने के लिए अपना हक माँगता है, रिश्वत हक कहलाने लगी है । यह किसी विशेष कृपा के लिए नहीं वरन् ठीक तरह भलमनसाहत से काम पूरा कर देने के लिए हक माँगा जाता है यदि न दिया जाय तो ऐसी अड़चनें डाली जाती हैं जिनको सहन करना मध्यमवृत्ति के मनुष्य के लिए बड़ा कठिन होता है । अधिक हक देने पर तो न करने योग्य कामों को हँसी खुशी से कर देते हैं । जिन लोगों से न्याय और सद्व्यवहार की आशा की जानी चाहिए वहाँ रिश्वत ने हक का रूप धारण कर लिया है, चोरी को सीनाजोरी की जुर्रत हो गई है । यह हरकतें अब बन्द होनी चाहिए । अस्तेय का वास्तविक तात्पर्य है-अपना वास्तविक हक खाना धर्म पूर्वक जो वस्तु जितनी मात्रा में अपने को मिलनी चाहिए उसे उतनी ही मात्रा में लाना, पूरा एवज चुकाकर किसी वस्तु को ग्रहण करने का ध्यान रखा जाय तो चोरी से सहज ही छुटकारा मिल सकता है । जो कुछ आपको मिल रहा है उसके बारे में विचार कीजिए कि क्या वास्तव में इस वस्तु पर मेरा धर्म पूर्वक हक है? किसी दूसरे का भाग तो नहीं खा रहा हूँ? जितनी मुझे मिलनी चाहिए उससे अधिक कर रहा हूँ? अपने कर्तव्य में कमी तो नहीं ला रहा हूँ? जिनको देना चाहिए उनको दिए बिना तो नहीं ले रहा हूँ? इन पाँच प्रश्नों की कसौटी पर यदि अपनी प्राप्त वस्तु को कस लिया जाय तो यह मालूम हो सकता है कि इसमें चोरी तो नहीं है या चोरी का कितना अंश है । किसी का ताला तोड़कर या जेब काटकर कुछ तो चोरी है ही, साथ ही कर्तव्य में त्रुटि रखना और हक से अधिक लेना भी चोरी है । इन चोरियों से बचते हुए अपनी पसीने की कमाई पर निर्भर रहना चाहिए । स्वयं चोरी से बचना तो आवश्यक है ही, साथ ही दूसरों को भी बचाना चाहिए, कम से कम चोरी में सहयोग करना तो बन्द कर ही देना चाहिए । रिश्वत देकर यदि कोई काम बनता हो, और न देने से हानि हो तो उस हानि को ही सहन करना चाहिए, क्योंकि पशु हत्या में जैसे काटने वाले, बेचने वाले, खाने वाले, पकाने वाले सबको पाप लगता है वैसे ही चोरी के काम में किसी प्रकार मदद करने या चोरी की हिम्मत बढ़ने देने से अपने को भी पाप का भागी होना पड़ता है । यदि अपना या किसी दूसरे का हक कोई दुष्ट दुरात्मा बलात्कारपूर्वक अपहरण करता हो तो उसके विरुद्ध संघर्ष करना चाहिए ताकि विश्व परिवार में से चोरी और अनीति की थोड़ी-बहुत मात्रा कम हो । स्वयं चोरी न करना और न दूसरों को करने देना यह एक ही अस्तेय धर्म के दो अंग हैं, योग मार्ग के साधक को दोनों ओर उसी प्रकार ध्यान रखना चाहिए जैसे साइकिल चलाने वाला दोनों पैरों को समान रूप से घुमाता है । ब्रह्मचर्य आमतौर से ब्रह्मचर्य का अर्थ वीर्य पात न करना समझ जाता है । जो व्यक्ति स्त्री सम्पर्क से बचते हैं, उन्हें ब्रह्मचारी कहा जाता है । यह आधा अर्थ हुआ, आधा अभी शेष है । ब्रह्म का अर्थ है परमात्मा में आचरण करना जीवन लक्ष में तन्मय हो जाना, सत्य की शोध में सब ओर चित्त हटाकर जुट पड़ना, ब्रह्म का ही आचरण है । इसके साधनों में वीयर्पात न करना भी एक है । महात्मा गाँधी ने इस सम्बन्ध में बहुत ही उत्तम कहा है-ब्रह्मचर्य का मूल अर्थ सब याद रखें । ब्रह्मचर्य अर्थात ब्रह्म की-सत्य की शोध में चर्या अर्थात तत्सम्बन्धी आचार । इस मूल अर्थ से सर्वेईन्द्रिय संयम का विशेष अर्थ निकलता है सिर्फ जननेन्द्रिय संयम के अधूरे अर्थ को तो हम भुला ही दें । जननेन्द्रिय निरोध को ही ब्रह्मचर्य का पालन माना गया है । मेरी राय में यह अधूरी और खोटी व्याख्या है । विषय मात्र का निरोध ही ब्रह्मचर्य है । जो और इन्द्रियों को जहाँ तहाँ भटकने देकर केवल एक ही इन्द्री को रोकने का प्रयत्न करता है, वह निष्फल प्रयत्न करता है । कान से विकार की बातें सुनना, आँख से विकार उत्पन्न करने वाली वस्तु देखना, जीभ से विकारोत्तेजक वस्तु चखना, हाथ से विकारों को भड़काने वाली चीज को छूना और साथ ही जननेन्द्रिय को रोकने का प्रयत्न करना, यह तो आग में हाथ डालकर जलने से बचने का प्रयत्न करने के समान हुआ । इसीलिए जो जननेन्द्रिय को रोकने को निश्चय करे उसे पहल ही से प्रयत्न इन्द्री को उस इन्द्रियों के विकारों से रोकने का निश्चय कर ही लिया जाना चाहिए । मैंने सदा से यह अनुभव किया है कि ब्रह्मचर्य की संकुचित व्याख्या से नुकसान हुआ है । मेरा तो यह निश्चित मत है और अनुभव है कि यदि हम सब इन्द्रियों को एक साथ वश में कर लें तो जननेन्द्रियों को वश में करने को प्रयत्न शीघ्र ही सफल हो सकता है, तभी उसमें सफलता प्राप्त की जा सकती है । इसमें मुख्य स्वाद इन्द्री है । मेरा अपना अनुभव तो यह है कि यदि अस्वाद व्रत का भलीभाँति पालन किया जाय तो जननेन्द्री का संयम बिल्कुल आसान हो जाय । स्वाद की दृष्टि से किसी वस्तु को न खाकर आवश्यकता के विचार से लेना अस्वाद है । ब्रह्मचर्य का पालन मन, वचन और काया से होना चाहिए । हमने गीता में पढ़ा है कि जो शरीर को काबू में रखता हुआ जान पड़ता है पर मन से विकार को पोषण किया करता है वह मूढ़,मिथ्याचारी है । मन को विकारपूर्ण रहने देकर शरीर को दबाने की कोशिश करना हानि कारक है । जहाँ मन है वहाँ अन्त को शरीर भी घिसटे बिना नहीं रहता । यहाँ एक भेद समझ लेना जरूरी है । मन को विकार वश होने देना एक बात है और मन का अपने आप अनिच्छा से बलात् विकार को प्राप्त होना या होते रहना दूसरी बात है । इस विकार में यदि हम सहायक न बनें तो आखिर जीत हमारी ही है । हम प्रतिपल यह अनुभव करते हैं कि शरीर तो काबू में रहता है पर मन नहीं रहता । इसलिए शरीर को तुरन्त ही वश में करके मन को वश में करने की रोज कोशिश करने से हम अपने कर्तव्य का पालन करते हैं-कर चुकते हैं । वीर्य का उपयोग तो शारीरिक और मानसिक शक्ति को बढ़ाने में है । विषय भोग में उसका उपयोग करना, उसका अति दुरुपयोग है, इसके कारण वह कई रोगों को मूल बन जाता है । जीवनोद्देश्य की पूर्ति में, सत्कामो द्वारा ईश्वर को प्रसन्न करने के प्रयत्न में, ब्रह्म भावना की चर्या में तन्मयता प्राप्त करने के लिए इन्द्रियों को संयम अत्यन्त आवश्यक है । जिसकी इन्द्रियाँ अपने-अपने विषय में दौड़ी फिरती हैं, उसका चित्त एक स्थान पर ठहर नहीं सकता और न उच्च उद्देश्यों में दिलचस्पी ले सकता है । दीर्घ जीवन, निरोगता, शरीर की पुष्टता, सुड़ौलता, बलबुद्धि, तेज, बुद्धि की प्रखरता आदि शारीरिक लाभों की नीव इन्द्रिय संयम के ऊपर रखी होती है, शक्तियों का खर्च भोगों में न होगा तो उसके द्वारा शरीर और मस्तिष्क बलवान हो सकेगा अन्यथा जिस प्रकार फूटे हुए दीपक में से तेल चूता रहता है तो वह अधिक समय तक अधिक प्रकाश के साथ न जल सकेगा, जिस वृक्ष की जड़ों में कीड़े या दीमक लग रहे हों वह निर्बल और अल्पजीवी ही होगा यही बात मनुष्य की है । असंयम के कारण इन्द्रिय भोगों में जिसकी शक्ति अधिक मात्रा में खर्च होती रहती है, वह न तो शरीरिक दृष्टि से निरोग,बलवान एवं दीर्घजीवी हो सकता है और न मानसिक दृष्टि से ही मेधावी, मनस्वी एवं प्रभावशाली हो सकता है, फिर ब्रह्म के आचरण में रत होना तो दूर की बात है । इन्द्रिय संयम का तात्पर्य है, विवेक के साथ मर्यादा के अन्तर्गत इन्द्रियों का उपयोग होना । इन्द्रियों के आधीन अपने को इतना अधिक नहीं होना चाहिए कि भोगेच्छा को रोका न जा सके या रोकने में बहुत आदत डालनी चाहिए कि इन्द्रियों की इच्छा को जब चाहे तब आसानी से रोक सकें और भोग सामने हो तो भी उसे छोड़ सकें । कहने को पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ हैं पर वास्तव में दो का ही संयम करना है । नाक, कान, आँख के भोग तो कभी-कभी और कम मात्रा में मिलते हैं, इसलिए उनकी अधिक चाट नहीं होती और न उनमें इतनी प्रबलता ही होती है । जिन पर काबू पाना है, वह हैं-स्वाद और कामवासना । जीभ के चटोरपन की प्रेरणा से किसी भी वस्तु को खाने से इन्कार कर देना चाहिए । चटपटे, मीठे,खारी, खट्टे, चिकने पदार्थों को देखकर चटोरे मनुष्यों के मुँह में पानी भर आता है, इस वृत्ति को रोकना चाहिए । जब इस प्रकार मन चल रहा हो तो हठात् उस वस्तु को न खाने की प्रतिज्ञा करनी चाहिए और दृढ़तापूर्वक उसका पालन करना चाहिए । कुछ समय के लिए बीच-बीच में कुछ समय तक नमक और मीठा छोड़ने का प्रयोग करते रहना चाहिए जो वस्तु आवश्यक और लाभदायक हो उसे स्वाद रहित होते हुए भी सेवन करना चाहिए । इसी प्रकार गृहस्थ होते हुए भी कभी-कभी कुछ समय के लिए ब्रह्मचर्य से रहने के व्रत उन्हें पूरा करते रहना चाहिए । अन्य स्त्रियों को बहिन या पुत्री की दृष्टि से देखना चाहिए । कुदृष्टि के उत्पन्न होते ही अपना एक कान ऐंठ कर अपने आप जोर से चपत लगानी चाहिए । गन्दी पुस्तकों से, तस्वीरों से और संगीत से बचना चाहिए । इस प्रकार धीरे-धीरे स्वाद और कामवासना पर विजय प्राप्त की जा सकती है । किसी बात को पूरा करने के लिए मनुष्य दृढ़ प्रतिज्ञा हो जाय और प्रयत्न बराबर जारी रखें तो कोई कारण नहीं कि उसमें सफलता प्राप्त न हो । Source: http://hindi.awgp.org

योग आवश्यक – Why yoga is necessary?


योग हमारे लिए हर तरह से आवश्यक है. यह हमारे शारीरिक, मानसिक और आत्मिक स्वास्थ्य के लिए लाभदायक है. योग का उद्देश्य शरीर, मन और आत्मा के बीच संतुलन अर्थात योग बनाना है. योग के उद्देश्य को पूरा करने के लिए मुद्रा, ध्यान और श्वसन सम्बन्धी अभ्यास की आवश्यकता होती है. योग की क्रियाओं में जब तन, मन और आत्मा के बीच योग बनता है तब आत्मिक संतुष्टि, शांति और चेतना का अनुभव होता है. इसके अतरिक्त योग शारीरिक और मानसिक रूप से भी फायदेमंद है. योग शरीर को शक्तिशाली एवं लचीला बनाए रखता है साथ ही तनाव से भी छुटकारा दिलाता है जो रोजमर्रा की जि़न्दगी के लिए आवश्यक है. योग से शरीर में रोग प्रतिरोधी क्षमता का विकास होता है. योग करने वाले वृद्धावस्था में भी चुस्त दुरूस्त रहते हैं. आयु के संदर्भ में भी योग लाभप्रद है.

योग के प्रकार – Types of Yoga


योग के कई प्रकार हैं जिनमें कुछ प्रमुख योग के प्रकार हैं- हठयोग,अष्टांगयोग, कर्मयोग, राजयोग, मंत्रयोग, तंत्र योग. यहां आगे हम सिर्फ अष्टांगयोग के बारे में लिखेंगे.

योग किसके लिए


योग किसी भी उम्र के स्वस्थ स्त्री पुरूष कर सकते हैं. स्वास्थ्य सम्बनधी परेशानियों में भी योग किया जा सकता है लेकिन इसमें कुछ सावधानायों का ख्याल रखना होता है. जो व्यक्ति शरीर को बहुत अधिक घुमा फिरा नहीं सकते हें वह भी कुर्सी पर आराम से बैठकर योग कर सकते हैं. योग हर किसी की जरूरत है. कामकाजी लोग अपने दफ्तर में भी कुछ देर योग करके अत्यधिक काम के दबाव के बावजूद भी खुद को तरोताजा महसूस कर सकते हैं. शारीरिक कार्य करने वाले जैस खिलाड़ी, एथलिट्स, नर्तक अपने शरीर को मजबूत, उर्जावान और लचीला बनाए रखने के लिए योग कर सकते हैं. छात्र मन की एकाग्रता और ध्यान के लिए योग कर सकते हैं।

योग का जन्म – History of Yoga


पुरातत्ववेत्ताओं ने जो साक्ष्य प्राप्त किये हैं उनसे पता चलता है कि योग की उत्पत्ति 5000 ई. पू. में हुई होगी. गुरू शिष्य परम्परा के द्वारा योग का ज्ञान परम्परागत तौर पर एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को मिलता रहा. लगभग 200 ई0 पू. पू. में महर्षि पतंजलि ने योग को लिखित रूप में संग्रहित किया और योग-सूत्र की रचना की. योग-सूत्र की रचना के कारण पतंजलि को योग का पिता कहा जाता है.

योग क्या है -What is Yoga?


"योग अतीत के गर्भ में प्रसुप्त कोई कपोल- कथा नहीं है। यह वर्तमान की सार्वधिक मूल्यवान विरासत है। यह वर्तमान युग की अनिवार्य आवश्यकता और आने वाले युग की संस्कृति है ।" - स्वामी सत्यानन्द सरस्वती स्वस्थ रहने के लिए आहार- विहार का संयम और नियमित दिनचर्या का क्रम जितना आवश्यक है, उतना ही यह भी आवश्यक है कि शरीर के सभी अंग सक्रिय और जीवन्त रहें । आजकल तमाम संपन्न व्यक्ति जिन्हें पोषक आहार के साथ जीवन कि तमाम सुविधायें उपलब्ध हैं, वे भी तमाम शारीरिक रोगों से पीड़ित रहते हैं । शरीर एक पूरी फेक्ट्री ढ तरह है जिसमें तमाम तरह कि क्रियाएँ चलती रहती हैं । शरीर में जहाँ उपयोगी तत्व बनते रहते हैं वहीं विकार भी पैदा होते हैं, जिनको समय पर शरीर से बहार निकलना आवश्यक होता है । कई तरह कि टूट- फूट भी होती रहती है, जिसकी मरम्मत करनी होती है । नये कोशों का निर्माण होता रहता है, जिसके लिए उपयुक्त व्यवस्था बनानी पड़ती है । इन सबके लिए नियमित संतुलित व्यायाम भुत उपयोगी सिध्द होता है । इसलिए शरीर के विकार बहार करने और शरीर के अंगों को विकसित करने, उनका स्वास्थ्य बनाये रखने के लिये नियमित योगासन आवश्यक हो जाता है । योगासन जीवन के लिये बहुत उपयोगी है, लेकिन इसमें समय बहुत समय लगाना पड़ता है । एक- एक आसन के पश्चात कुछ क्षण के लिये शिथिलीकरण करने से ही उसका पूरा लाभ मिल पता है । जबकि व्यस्त जीवन में सामान्य मनुष्य उतना समय निकाल नहीं पाता । इसलिए किन्हीं विशेष प्रयोजनों के लिए विशेष प्रयासपूर्वक आसन का लाभ तो लिया जा सकता है, लेकिन सामान्य क्रम में आसनों के विज्ञान का उपयोग करते हुए आसनों का कुछ सहज क्रम आवश्यक हो ज्ञा है । एसे व्यायामों में आसनों कि मुद्रायें और शरीर के जोड़ और मांसपेशियों को संतुलित हलचल दे सकने वाली क्रियाओं का संयोग किया जाता है । "सूर्य नमस्कार" और "प्रज्ञायोग" एसे ही प्रयोगों में से एकहै । योग एक सम्यक जीवन का विज्ञान है, अतः इसका समावेश हमारे दैनिक जीवन में एक नित्यचर्या के रूप में होनी चाहिए । यह हमारे व्यक्तित्व के शारीरिक, प्राणिक, मानसिक, भावनात्मक, अतीन्द्रिय और आध्यात्मिक सभी पहलुओं को प्रभावित करता है । योग शब्द का अर्थ है 'ऐक्य' या 'एकत्व' होता है और यह संस्कृत धातु 'युज' से बना है जिसका अर्थ होता है 'जोड़ना'। व्यवहारिक स्तर पर योग शरीर, मन और भावनाओं में संतुलन और सामंजस्य स्थापित करेने का एक साधन है । आसन, प्राणायाम, मुद्रा, बांध, षट्कर्म और ध्यान के अभ्यास से यह संतुलन पाया जा सकता है। स्थूल शरीर से प्रारंभ कर योग मानसिक और भावनात्मक स्तर की और अग्रसर होता है । अनेक लोग दैनिक जीवन के दबावों और आपसी व्यवहारों से उत्पन्न भय और मानसिक रोगों से पीड़ित होते हैं । योग समस्त व्याधियों को निर्मूल तो नहीं कर सकता, परन्तु उनसे जूझने की प्रमाणिक विधि प्रदान कर सकता है । योगाभ्यास से भावनात्मक, मानसिक और शारीरिक स्तरों के आपसी संबंधों के प्रति सजगता का विकास होता है। साथ ही यह सजगता भी आती है की इनमें से किसी एक में असंतुलन उत्पन्न होने पर अन्य भी प्रभावित हुए बिना नहीं रहते। कर्मश: यह सजगता अस्तित्व के सूक्ष्म क्षेत्रों को समझने की क्षमता प्रदान करती है ।

Wednesday, November 18, 2015

अपने आप से १९ प्रश्न पूछिये

१. क्या हम तीव्र भूख लगने पर ही खाते हैं ?
२. पहला भोजन पचने की प्रतीक्षा किये बिना क्या बीच-बीच में कुछ वस्तुयें स्वाद के लिए तो नहीं खाते रहते हैं ?
३. कहीं आधे पेट से आधिक भोजन तो नहीं कर लेते ?
४. कहीं पतली चीजों के साथ भोजन जल्दी तो नहीं निगल लेते ?
५. क्या भोजन में अन्न आधे से काम रहता है ?
६. कहीं हमारा भोजन मांस, मछली, पकवान, मिठाई, चटनी, आचार, मिर्च मसले जैसे हानिकारक पदार्थों से नहीं भरा रहता है ?
७. चाय, तम्बाकू, पान की भरमार से पेट ख़राब तो नहीं हो रहा है ?
८. क्या जल्दी सोते, जल्दी उठते है ?
९. क्या हमारी रोटी बेईमानी से तो कमाई हुई नहीं होती ?
१०. क्या इतना श्रम करते हैं कि थककर रात को दो जाएँ ?
११. क्या दिनचर्या में व्यायाम, मालिस, आसन, टहलना शामिल हैं ?
१२. क्या हमको गंदगी से घृणा है ?
१३. क्या हम ब्रह्मचर्य कि मर्यादा का पालन करते हैं ?
१४. क्या हम चिन्ता, शोक, क्रोध, आवेश, इर्ष्या, द्वेष, उत्तेजना, भय, आशंका, निराशा से ग्रसित तो नहीं हैं ?
१५. हंसने और मुस्कुराने कि आदत तो नहीं छोड़ डि है ?
१६. क्या हम उपवास करते हैं ?
१७. शारीरिक, मानसिक श्रम कि मात्र शक्ति से बहार तो नहीं हैं ?
१८. बात बात में दवादारू कि भरमार तो नहीं करते हैं ?
१९. क्या हमने उपासना के लिए दैनिक कार्यक्रम में कोई समय नियत रखा हैं ?Pragyayoga.blogspot.in

योग करने के फायदे

१. रोज योग करने से आप सेहतमंद, उत्साहित, शांत और रह सकते है।
२. योग आपको लचीला, नम्र और आपके शरीर को ताकतमन्द बनता है।
३. योग करने से शरीर के अंदर के शारीरिक एवं मानसिक तनाव को दूर करता है।
४. योग को हम धयान भी कह सकते है , योग और ध्यान दोनों को करने के लिए शांति और एकाग्रता की आवयश्कता होती है ।
५. योग करने से हमारे शरीर के सभी जोड़ ( जॉइंट ) को मजबूत होता है ।
६. शरीर के जोड़ के अंदर चिकनाई बढ़ाना एवं नसों के अंदर के विकार को दूर करना हो योग सर्वोत्तम उपाय है ।
७. शरीर के आंतरिक अंगों को भी स्वस्थ रखने में बहुत उपयोगी है।
८. योग से आपके अंदर आत्मविस्वास को भी बढ़ता है।
९. योग करने से आपके अंदर शारीरिक , मानसिक और आध्यात्मिक विकास होता है।
१०. योग को शांति के साथ और ठीक ढंग से करना चाहिए।Pragyayoga.blogspot.in

Sunday, February 6, 2011

कब्ज का सरतिया इलाज

कब्ज का सरतिया इलाज
1. रात को खाना खाने के १ घंटे बाद एक ग्लास दुध में एक चम्मच गाय के घी मिलाकर पि लें ।
2. सुबह उठने के बाद में तीन ग्लास गर्म पानी बैठकर पिए और थोरी देर के बाद शौच जाएँ ।
कब्ज ठीक हो जायेगा ।

Friday, January 28, 2011

आखों की ज्योति कैसे वापस ला सकते है, बिना दवा के ।

आखों की ज्योति कैसे वापस ला सकते है, बिना दवा के ।
नित्य प्रातः नींद खुलने के बाद अपने थूक को अपने हाथ के अँगुलियों में लगा लें और एक बार गायत्री मंत्र बोले और पुनः गायत्री मंत्र बोलते हुये काजल के जैसे अपने आखों में लगावे नित्य प्रातः लगावें निश्चित ही लाभ होगा ।
Pragyayoga.blogspot.in

Saturday, November 27, 2010

Youth Icone

युवाओं का आदर्श कैसा होना चाहिए

http://www.diya.net.in

Youth Icone

युवाओं का आदर्श कैसा होना चाहिए

Wednesday, November 10, 2010

प्रातः उठते ही हाथों के शुभ दर्शन करें i

(प्रातः उठते ही हाथों के शुभ दर्शन माने गये हैं।)



कराग्रे वसते लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती।

करमूले स्थितो ब्रह्मा प्रभाते करदर्शनम्।।



(अर्थात् हाथों के अग्र भाग में लक्ष्मी, मध्य में सरस्वती और मूल भाग में ब्रह्माजी निवास करते हैं। अतः प्रातः उठते ही हाथों का दर्शन करें।)

Monday, April 19, 2010

सोऽहं साधना क्या है ?


सोऽहं सदना एक प्राणयोग प्रक्रिया है । इस अभ्यास के लिए अपने नित्यकर्म से निवृत होकर, नहाने के बाद इस अभ्यास को करे तो बहुत ज्यादा लाभ होता है । कमर सीधी करके बैठे किसी ध्यानात्मक आसन या सुखासन में बैठ जाएँ । शरीर को ढीला और मन को खाली छोड़ दीजिये, रीड सीधी रानी चाहिए । श्वास लेते समय एक आवाज आती है "सो" और श्वास छोड़ते समय एक आवाज आती है "हं" इसी दोनों आवाज को सुनना हीं सोऽहं सदना कहलाती है ।

Saturday, April 10, 2010

कम खाओ, गम खाओ

संसार में अधिकांश अधिक खाने वले रोगों के शिकार पाए जाते है । हित- मित- नियमित आहार लेनेवाले संयमी व्यक्ति ही स्वस्थ व दीर्घजीवी होते हैं ।

इंग्लैंड के टामस पार नियमित आहार के लिए बड़े प्रसिद्ध हुये । वे नित्य सादा, हल्का, सुपाच्य आहार लेते थे । उनहोंने ४० वर्ष की उम्र के बाद मिठाई, शराब, मांसको छुआ तक नहीं । वे सदैव निरोग व प्रसन्न रहते थे ।

इंग्लैंड के राजा चार्ल्स प्रथम ने उनकी कीर्ति सुनी तो उन्हें अत्यंत आश्चर्य हुआ । उनहोंने ऐसे दीर्घजीवी व्यक्ति के दर्शन करना चाहा । तामस पार को बड़े आदर से राजमहल में बुलाया ज्ञा । भरी दावत का आयोजन भी किया ज्ञा । भोजन के समय स्वादिष्ट मिठाईयाँ, विभिन्न प्रकार के पकवान और सुस्वादु मांस इत्यादी उन्हें अत्यंत आग्रहपूर्वक पड़ोसे गये । उनके पेट में दर्द होने लगा तब तक उन्हें खिलायाग्य । बेचारे मिताहारी तामस पार पार इस शाही भोजन का भयंकर दुष्प्रभाव पड़ा । उसी रात्रि उनकी मृत्यु हो गयी । उस समय उनकी आयु १५२ वर्ष की थी । एकाएक मृत्यु का कारण ढूँढा ज्ञाव इतने भारी, अस्वभाविक आहार के कारण उनके ह्रदय व पेट पार बाल पड़ा, जिससे ह्रदयगति रुक गयी और वे मृत्यु के शिकार हो गये

अत: शरीर के अंगों के साथ अति करके अपने स्वास्थ्य की इति न करें । सयम की आवयश्कता सभी को है। यह संयम सैनिकों को सुरक्षित रखता है । यह संयम साधकों की साधना में सुवास लता है । जबकि फ्रायड के विकृत मनोविज्ञान से उन देशों में लाखों युवक-युवतियाँ विनाश के रस्ते बढ़ गये । हे भारत के सपूतों ! सयंम- सदाचार व सच्चे सुख को पाने के लिए ही धरती पर तुम्हारा आगमन हुआ है ।

हिम्मत करो........... संयमी-साहसी बनो । सफलता तुम्हारे चरण चूमेगी ।

भूख से काम खाओ अथवा आधा पेट खाओ, चौथाई पानी के लिए एवम चौथाई पेट हवा के लिए खली छोडो।

 शरीर को भगवान का मंदिर समझकर, आत्म संयम और नियमितता द्वारा आरोग्य की रक्षा करेंगे ।

"आप जितना खाते हैं उससे आधे भोजन से आपका पेट भरता है और आधे भोजन से डॉक्टरों का पेट भरता है । आप आधा भोजन ही करें तो आप बीमार ही नहीं पड़ेंगे और डॉक्टरों की कोई खास आवश्यकता नहीं रह जाएगी"

Friday, April 9, 2010

अपने आप से १९ प्रश्न पूछिये

१. क्या हम तीव्र भूख लगने पर ही खाते हैं ?
२. पहला भोजन पचने की प्रतीक्षा किये बिना क्या बीच-बीच में कुछ वस्तुयें स्वाद के लिए तो नहीं खाते रहते हैं ?
३. कहीं आधे पेट से आधिक भोजन तो नहीं कर लेते ?
४. कहीं पतली चीजों के साथ भोजन जल्दी तो नहीं निगल लेते ?
५. क्या भोजन में अन्न आधे से काम रहता है ?
६. कहीं हमारा भोजन मांस, मछली, पकवान, मिठाई, चटनी, आचार, मिर्च मसले जैसे हानिकारक पदार्थों से नहीं भरा रहता है ?
७. चाय, तम्बाकू, पान की भरमार से पेट ख़राब तो नहीं हो रहा है ?
८. क्या जल्दी सोते, जल्दी उठते है ?
९. क्या हमारी रोटी बेईमानी से तो कमाई हुई नहीं होती ?
१०. क्या इतना श्रम करते हैं कि थककर रात को सो जाएँ ?
११. क्या दिनचर्या में व्यायाम, मालिस, आसन, टहलना शामिल हैं ?
१२. क्या हमको गंदगी से घृणा है ?
१३. क्या हम ब्रह्मचर्य कि मर्यादा का पालन करते हैं ?
१४. क्या हम चिन्ता, शोक, क्रोध, आवेश, इर्ष्या, द्वेष, उत्तेजना, भय, आशंका, निराशा से ग्रसित तो नहीं हैं ?
१५. हंसने और मुस्कुराने कि आदत तो नहीं छोड़ डि है ?
१६. क्या हम उपवास करते हैं ?
१७. शारीरिक, मानसिक श्रम कि मात्र शक्ति से बहार तो नहीं हैं ?
१८. बात बात में दवादारू कि भरमार तो नहीं करते हैं ?
१९. क्या हमने उपासना के लिए दैनिक कार्यक्रम में कोई समय नियत रखा हैं ?

Saturday, April 3, 2010

प्राण तथा प्राणायाम

प्राणायाम वास्तविक विज्ञान है । यह अष्टांग योग का चतुर्थ अंग है । पतंजलियोग के द्वितीय अध्याय के ४९ वें सूत्र में प्राणायाम कि परिभाषा इस प्रकार कि गयी है "तस्मिन् सति श्वासप्रश्वासयोर्गतिविच्छेद: प्राणायाम:" - आसन के स्थिर होने पर श्वास-प्रश्वास कि गति का रोकना प्राणायाम है ।
शवास का अर्थ है वायु भीतर खींचना तथा प्रश्वास का अर्थ है वायु बाहर छोड़ना । श्वास प्राण कि बाह्य अभिव्यक्ति है । श्वास बिजली कि भाँति ही स्थूल प्राण है । प्राण सूक्ष्म है । प्राण सूक्ष्म है । श्वास पर नियंत्रण के द्वारा आप आंतरिक सूक्ष्म प्राण पर नियंत्रण कर सकते हैं । प्राण को वश में करने का अर्थ है मन को वश में करना । प्राण की सहायता के बिना मन काम नहीं कर सकता । प्राण के ही स्पंदन मन में विचार उत्पन्न करते हैं । प्राण हीं मन को गतिशील करता है । प्राण ही मन को चलायमान करता है । सूक्ष्म प्राण का मन के साथ गहरा सम्बन्ध है ।
श्वास की डोर से जीवन की माला गुंथी है । जिन्दगीं का हर फूल इससे जुड़ा और इसी में पिरोया है । श्वासों की लय और लहरें इन्हें मुस्कुराहटें देती हैं । इनमें व्यक्तिरेक, व्य्व्धायन, बाधाएँ- विरोध और गतिरोध होने लगे तो सब कुछ अनायास ही मुरझाने और मरने लगता है । शरीर हो या मन दोनों ही श्वासों की लय से लयबद्ध होते हैं । इसकी लहरें ही इन्हें सींचती हैं, जीवन देती हैं, यहाँ तक कि सर्वथा मुक्त एवं सर्वव्यापी आत्मा का प्रकाश भी श्वासों कि डोर के सहारे ही जीवन में उतरता है ।
श्वासों कि लय बदलते ही जीवन के रंग- रूप अनायास ही बदलने लगते हैं । क्रोध, घृणा, करुणा, वैर, राग- रोष, इर्ष्या-अनुराग प्रकारांतर से श्वास की लय भिन्न- भिन्न अवस्थाएँ ही हैं, यह बात कहने सुनने की नहीं, अनुभव करने की है । यदि महीने भर की सभी भावदशाओं एवम अवस्थाओं का चार्ट बनाया जाये तो जरुर पाता चल जायेगा की श्वास की कौन सी लय हमें शांति व विश्रांति देती है । किस लय में मौन और शांत, सुव्यवस्थित होने का अनुभव होता है ? किस लय के साथ अनायास ही जीवन में आनंद घुलने लगता है ? ध्यान और समाधी भी श्वासों की लय परिवर्तनशीलता ही है ।
श्वास की गति वलय को जागरूक हो परिवर्तित करने की कला ही तो प्राणायाम है । यह मानव द्वारा की गई अब तक की सभी खोजों में महानतम है, यहाँ तक की चाँद और मंगल ग्रह पर मनुष्य के पहुँच जाने से भी महान क्योंकि शरीर से मनुष्य कहीं भी जा पहुँचे, वह जस का तस रहता है, परन्तु श्वास की लय के परिवर्तन से तो उसका जीवन ही बदल जाता है । हालाँकि यह लय परिवर्तन होना चाहिए आंतरिक होशपूर्वक जो प्रत्येक श्वास के साथ होशपूर्वक रहना होगा और साथ ही श्वास-श्वास के साथ भगवान नाम के जप का अभ्यास करना होगा । ऐसा हो तो श्वासों की लय के साथ जीवन की लय बदल जाती है ।

हमारा गीता आधारित १८ सूत्रीय युग निर्माण सत्संकल्प

-:हमारा गीता आधारित १८ सूत्रीय युग निर्माण सत्संकल्प :-

१-हम ईश्वर को सर्वव्यापी और न्यायेकारी मानकर उसके अनुशासन को अपने जीवन में उतरेंगे.
२-शरीर को भगवन का मंदिर समझ कर आत्मसयम और नियेमितता द्वारा आरोग्य की रक्षा करंगे.
३-मन को कुविचारों और दुर्भाव्नाओ से बचाए रखने के लिए स्वाध्याये तथा सत्संग की व्यवस्था रखे रहेंगे.
४-इन्द्रिये सयम, अर्थ सयम, समय सयम और विचार सयम का सतत अभ्यास करेंगे.
५-अपने को समाज का एक अभिन्न अंग मानेगे और सबके हित में अपना हित समझेंगे.
६-मर्यादाओ को पालेंगे, वर्जनाओ से बचेंगे, नागरिक कर्तव्यों का पालन करेंगे और समाजनिस्ट बने रहेंगे.
७-समझदारी, ईमानदारी, जिम्मेदारी और बहादुरी को जीवन का एक अविछिन्न अंग मानेगे.
८-चारो ओर मधुरता, स्वछता, सादगी एवं सज्जनता का वातावरण उत्पन्न करेंगे.
९-अनीति से प्राप्त सफलता की अपेक्षा नीति पर चलते हुए असफलता को शिरोधार्ये करेंगे.
१०-मनुष्ये के मूल्यांकन की कसोटी उसकी सफलताओ, योग्यताओ एवं विभूतियो को नहीं, उसके सद्विचारों और सत्कर्मो को मानेगे.
११-दुसरो के साथ वह व्यव्हार नहीं करेंगे, जो हमे अपने लिए पसंद नहीं.
१२-नर नारी के प्रति पवित्र द्रष्टि रखेंगे.
१३-संसार में सत्प्रव्र्तियो के पुण्ये प्रसार के लिए अपने समय, प्रभाव, ज्ञान, पुरुषार्थ एवं धन का एक अंश नियेमित रूप से लगाते रहेंगे.
१४-परम्पराओ की तुलना में विवेक को महत्व देंगे.
१५-सज्जनों को संघटित करने, अनीति से लोहा लेने और नवसर्जन की गतिविधियो मैं पूरी रूचि लेंगे.
१६-राष्ट्रिये एकता एवं समता के प्रति निष्टावान रहेंगे. जाती, लिंग, भाषा, सम्प्रदाय आदि के आधार पर कोई भेदभाव न बरतेंगे.
१७-मनुष्ये अपने भाग्ये का निर्माता आप है -इस आधार पर हमारी मन्येता है की हम उत्कृष्ट बनेंगे और दूसरो को श्रेष्ठ बनाएंगे, तो युग अवश्य बदलेगा.
१८-हम बदलेंगे युग बदलेगा इस तथ्य पर हमारा परिपूर्ण विश्वास है. .